गुरुवार, मार्च 24, 2016

बाग़

आदमी जवानी की उम्र में बाग़ लगाता है ताकी बुढ़ापे की उम्र में उसका फल खाए, फिर वह शख्स कैसा बदनसीब है जिसका हरा-भरा बाग़ उसकी आख़िरी उम्र में ऐन उस वक़्त बर्बाद हो जाए |
जबकि वह सबसे ज़्यादा उसका मोहताज हो और उसके लिए वह वक़्त भी ख़त्म हो चूका हो जबकि वह ना बाग़ लगाए, उसे नए सिरे से तैयार करे, क्या रियाकारी का यही हासिल नहीं है... ?

निज़ाम

ज़मीन के ऊपर शुक्र, सब्र, तवाज़ो और कनाअत के साथ रहना ज़मीन की इस्लाह है इसके विपरीत नाशुक्री, बेसब्री, घमंड और हिर्स के साथ ज़मीन में रहना फसाद बरपा करना है क्योके इससे खुदा का कायम किया हुवा फ़ितरी निज़ाम टूटता है यह हद से निकल जाना है ।
जबके अल्लाह चाहता है हर एक अपनी हद के अंदर अमल करे।

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