कुरआन का हर लफ्ज़ अपनी जगह सही



   कुरआन का हर लफ्ज़ अपनी जगह सही: सुनिए  Nouman Ali Khan  को 





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लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-05

लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-05

एक कौल यह भी है की यह “ला-ह यलूहु” से निकला है जिसके मायने छुप जाने और पर्दा करने के है, और यह भी कहा गया है की यह “अलाहुल-फ़सील” से है! चूँकि बन्दे उसी की तरफ़ फ़रियाद और ज़ारी से झुकते है, उसी के दामने रहमत को हर हाल में थामते है इसलिए उसे “अल्लाह” कहा गया! एक कौल यह भी है की अरब के लोग ‘अलहुर्रजुलु यअलहू’ उस वक़्त कहते है जब किसी अचानक चीज़ और बात से कोई घबरा उठे और दुसरा उसे पनाह दे और बचा ले! चूँकि तमाम मख्लूक़ को हर मुसीबत से निजात देने वाला अल्लाह सुब्हान्हू व तआला है, इसलिए उसे ‘अल्लाह’ कहते है जैसा की कुरआने करीम में मौजूद है:
यानी वही बचाता है और उस पर कोई नहीं बचाया जाता

असली नमतें देने वाला वही है! फ़रमाता है की तुम पर जितनी नेमतें है वे सब अल्लाह तआला की दी हुई है! वही खिलाने वाला है , फ़रमाता है की वह खिलाता है और उसे कोई नहीं खिलाता! वही ‘मूजिद’ है, फ़रमाता है की हर चीज़ का वजूद अल्लाह की तरफ से है ! इमाम राज़ी का मुख्तार (पसंदीदा) मज़हब यही है की लफ्ज़ ‘अल्लाह’ मुश्तक़ (किसी लफ्ज़ से निकला हुआ) नहीं है! ख़लील, सीबवैह, अक्सर उसूली और फ़ुकहा हज़रात का यही कौल है! इसकी बहुत-सी दलीले भी है! अगर यह मुश्तक़ (किसी और लफ्ज़ से निकला हुआ) होता तो इसके मायने में बहुत से अफ़राद की शिर्कत होती, हालाँकि ऐसा नहीं! फिर इस लफ्ज़ को मोसुफ़ बनाया जाता है और बहुत-सी इसकी सिफ़तें आता है जैसे ‘रहमान, रहीम, मालिक,
क़ुददूस’ वगैरह, तो मालूम हुवा की यह मुश्तक़ नहीं!




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लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-04

लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-04
इस बिना पर असल में यह लफ्ज़ “वलाहू” था “बाब” को हमज़ा से बदल दिया गया जैसे की ‘वशाह’ और ‘वसादत’ में ‘इशाह’ और ‘इसादा’ कहते है! इमाम राज़ी का कौल है की यह लफ्ज़ ‘अलहतु इला फ़ुलानिन’ से बना है जो की मायने में “सुकून ओ राहत” के है, यानी मैंने फुलां से सुकून और राहत हासिल की, चूँकि अक्ल का सुकून सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात के ज़िक्र की तरफ से और रूह की हक़ीक़ी ख़ुशी उसी की मारिफ़त (पहचानने) में है, इसलिए कि हर तरह से वही कामिल है, उसके सिवा कोई और नहीं ! इसी वजह से ‘अल्लाह’ कहा जाता है ! कुरआन में है :


यानी ईमान वालों के दिल सिर्फ़ अल्लाह के ज़िक्र ही से इत्मीनान हासिल करते है

to be cont...



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रिश्वत और सूद

'रिश्वत' लेना जुर्म है , सब मानते हैं, और रिश्वत देना ? वो भी जुर्म है, और रिश्वत के लेन देन मे मध्यस्थता करना ? ज़ाहिर है वो भी जुर्म है , अब अगर कोई कहे कि रिश्वत लेने वालों का, रिश्वत देने वालों का और रिश्वत के लेन देन मे मध्यस्थता करने वालों का बायकाट करो तो यह बात कहने वाला इस वक़्त का समाज सुधारक कहलायेगा, उसके नारे लगेंगे, गजरे डाले जायेंगे, और अगर उसके कहने से कुछ लोगों ने रिश्वत लेना देना छोड़ दिया तो कहने वाले की तस्वीरें किताबों मे छप जायेगी,
लेकिन अगर कोई सूद के लेने, देने और सूद के लेन देन मे मध्यस्थता करने को मना करता है तो वो इस दौर का सबसे बड़ा जाहिल, रूढ़िवादी और विकास विरोधी माना जा रहा है क्योंकि कहने वाला मुसलमान है, ऊपर से मौलवी, मौलवी पर तो रूढ़िवादी, कटटर जैसे अलफ़ाज़ बहुत सूट करते हैं, और मौलवी को कटटर रूढ़िवादी कहकर ख़ुद को आधुनिक, शिक्षित, विकसित मान लेने की फ़ीलिंग भी अलग ही है, इसलिए सूद अच्छी चीज़ हो न हो पर मौलवी ने क्यों कहा ? मौलवी की मुख़ालफ़त का आलम यह है कि अगर मौलवी नंगे रहने, ज़िना करने या शराब पीने को भी ग़लत बता दे तो कुछ लोग शराब पीकर, नंगे होकर सड़क पर ज़िना करेंगे
अब बात करते हैं सूद की, सूद शोषण की एक वजह है, सूद की वजह से न जाने कितनों के मकान सूदख़ोर ने क़ब्ज़ा लिये, कितनों के खेत क़ब्ज़ा लिये, न जाने कितने ग़रीबों की लड़कियों, बीवियों के साथ ग़लत काम सूदख़ोरों ने किया, न जाने कितने ग़रीबों को ख़ुदकुशी करनी पड़ी, सूद एक बड़ी बुराई है इसका ख़त्म होना ज़रूरी है, यह क़ायदा है कि जब किसी बुराई को ख़त्म किया जाता है तो उस बुराई के फलने फूलने, पनपने के रास्ते भी बंद किये जाते हैं, चूँकि मज़हब ए इस्लाम सूद को ख़त्म करना चाहता है इसलिए वो सूद को लेने, देने , सूद के लेन देन मे मध्यस्थता करना इन सबको नाजायज़ क़रार देता है और सूद के लेने, देने, लेनदेन की मध्यस्थता करने वालों का सोशल बायकाट करने की भी बात करता है, अब मज़हब ए इस्लाम के विद्वान मज़हब ए इस्लाम के अनुसार ही तो अपनी बात कहेंगे या पब्लिक का रूजहान देखकर कहेंगे ?
अब तुम्हें नही मानना है तो न मानो लेकिन बात तो तुम्हारी मर्ज़ी के मुताबिक़ नही कही जायेगी


Nadeem Akhter 

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लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-03

लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-03
बाज़ लोगों का यह कौल भी है की यह मुश्तक़ (दुसरे लफ्ज़ से निकला हुवा ) है और इस पर रुबा का एक शे’र बतौर दलील पेश करते है, जिसमें मस्दर “तअल-ह” का बयान है! जैसे की इब्ने अब्बास से मरवी है की वह :
पढ़ते थे ! मुराद इससे इबादत है, यानी उसकी इबादत की जाती है और वह किसी की इबादत नहीं करता! मुजाहिद रह० वगैरह कहते है की बाजों ने इस पर इस आयत से दलील दी है :
एक और आयत में है :
यानी वही अल्लाह है आसमानों में और ज़मीन में, वही है जो आसमान में माबूद है और ज़मीन में माबूद है!

इमाम सीबवैह ख़लील से नक़ल करते है की असल में यह ‘इलाह’ था, जैसे ‘फ़िआल’ फिर हमज़ा के बदले ‘अलिफ़ व लाम’ लाया गया जैसे “अन्नास” की इसकी असल “उनास” है! बाजों ने कहा है की लफ्ज़ ‘अल्लाह’ की असल ‘लाह’ है ‘अलिफ़ लाम’ हुरुफ़े ताज़ीम के तौर पर लाया गया है! सीबवैह का भी पसंदीदा कौल यही है! अरब शायरों के अशआर में भी यह लफ्ज़ मिलता है! कसाई और फर्रा कहते है की इसकी असल ‘अल-इलाहू’ थी, हमज़ा को हज़फ़ किया और पहले ‘लाम’ को दुसरे में जोड़ किया जैसे की ‘लाकिन्ना हुवाल्लाहू रब्बी’ में ‘लाकिन अ-न’ का ‘लाकिन्ना’ हुवा है! चुनाँचे हसन की किराअत में “लाकिन अ-न” ही है और इसका इश्तिकाक़ (निकलने का माददा) ”वलह” से है और इसके मायने ‘हैरान कर देने’ के है! ‘वलहुन’ अक्ल के चले जाने को कहते है! चूँकि ज़ाते बारी तआला में और उसकी सिफतों की तहक़ीक़ में अक्ल हैरान व परेशान हो जाती है इसलिए उस ज़ाते पाक को अल्लाह कहा जाता है!









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हम वफ़ादार थे, हैं, रहेंगे

' वफ़ादारी ' एक ऐसा लफ़्ज़ जिस पर बहुत कुछ कहा, सुना गया, शायरी भी की गयी, वफ़ादारी का विलोम ( antonym, मुतज़ाद) है ग़ददारी , जिस तरह हर इंसान ख़ुद को और अपनी क़ौम को वफ़ादार साबित करने के लिए लम्बे चौड़े दावे करता रहता है इसी तरह हर शख़्स दूसरे इंसान और उसकी क़ौम को ग़ददार साबित करने मे भी देर नही लगाता, वफ़ादारी का इम्तिहान लेने के लिए जो सबसे बड़ी शर्त है वो है ' अपनाना ' यानी जब तक आप किसी को अपनायेंगे नही आप उसकी वफ़ादारी का इम्तिहान नही ले सकते , यानि हम अपने नौकर, दोस्त, बीवी, पार्टनर की वफ़ादारी का इम्तिहान ले सकते हैं क्योंकि हम उन्हे अपना चुके हैं, अब कोई भी ऐसा शख़्स जिससे हमारा कोई ताल्लुक़ ही नही, कोई रिश्ता ही नही उसकी क्या वफ़ादारी और क्या ग़ददारी ?
अब इस कंसेप्ट पर मुसलमानों के बारे मे बात करते हैं, देश की साम्प्रदायिक ताक़तें हमेशा मुसलमानों की वफ़ादारी पर सवाल उठाती रही हैं, उन मुसलमानों की वफ़ादारी पर जिन्हे इन साम्प्रदायिक ताक़तों ने कभी अपनाया ही नही, मुसलमानों की दाढ़ी से नफ़रत, टोपी से नफ़रत, कुर्ते से नफ़रत, बुर्क़े से नफ़रत और सवाल वफ़ादारी पर , अपने मुहल्लों मे रहने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, चुनाव मे टिकट नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, स्कूल / कॉलेज मे पढ़ने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, नौकरी देंगे नही और सवाल वफ़ादारी पर, दोस्त बनायेंगे नही, बस मे बराबर की सीट पर बिठायेंगे नही, जायदाद न ख़रीदेंगे, न बेचेंगे, और सवाल वफ़ादारी पर , तो भाई जब आपने हमे अपनाया ही नही तो वफ़ादारी का इम्तिहान कैसे लिया ?
एक बात और समझो , वफ़ादारी एक तो होती है मुल्क से जिसके लिए हम वफ़ादार थे, हैं, रहेंगे , किसी पार्टी या किसी नेता का वफ़ादार होने के लिए हम मजबूर नही, साम्प्रदायिक पार्टियों और नेताओं के लिए तो बिलकुल नही, रही बात समाज की तो भाई अपनाकर देखलो, हमेशा वफ़ादार निकलेंगे, हां अफ़राज़ुल के घरवाले शम्भूलाल के वफ़ादार नही होंगे, जो तुम चाहते हो

Nadeem Akhter



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लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-02

लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-02
बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रत अबू हरैरह रज़ि० से रिवायत है की रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया –अल्लाह तआला के निन्नानवे नाम है, एक कम एक सौ, जो उन्हें याद करे जन्नती है ! तिर्मिज़ी और इब्ने माजा की रिवायत में उन नामों की तफ़सील भी आयी है और दोनों की रिवायतों में अलफ़ाज़ का कुछ फर्क कुछ कमी-ज़्यादती भी है ! इमाम राज़ी ने अपनी तफ़सीर में बाज़ लोगों से रिवायत की है की अल्लाह तआलाके पाँच हज़ार नाम है, एक हज़ार तो कुरानशरीफ और सही हदीसों में है और एक हजार तौरात में और एक हजार इंजील में और हज़ार ज़बूर में और एक हज़ार लौहे-महफूज़ में! “अल्लाह” वह नाम है जो सिवाय अल्लाह तबारक व तआला के किसी और का नहीं, यही वजह है की आज तक अरबी भाषा के माहिरीन को यह भी मालूम नहीं की इसका इश्तिकाक़ (यानी माददा) क्या है, इसका बाब क्या है बल्कि नहवियों की एक बड़ी जमाअत का ख्याल है की यह ‘इस्में जामिद’ है और इसका कोई इश्तिकाक़ (माददा और निकलने की जगह) है ही नहीं ! इमाम कुर्तुबी ने उलेमा-ए-किराम की एक बड़ी जमाअत का यह मज़हब नकल किया है, जिनमें से हज़रत इमाम शाफ़ई, इमाम ख़त्ताबी, इमामुल-हरमैन, इमाम गज़ाली वगैरेह है!

ख़लील और सीबवैह से रिवायत है की “अलिफ़ लाम” इसमें लाज़िम है, इमाम खत्ताबी ने इसकी एक दलील यह दी है की “या अल्लाह” कह सकते है मगर “या अर्रहमान” कहते किसी को नहीं सुना, अगर लफ्ज़ “अल्लाह” में “अलिफ़ लाम” असल कलिमे का न होता तो इस पर निदा (पुकार) का लफ्ज़ ‘या’ दाख़िल न हो सकता, क्योंकि अरबी ग्रामर के लिहाज़ से हुरुफें निदा का अलिफ़ लाम वाले इस्म (नाम) पर दाख़िल होना जायज़ नहीं ! 


to be continued...

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लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-01

लफ्ज़ “अल्लाह” की तहक़ीक़-01
“अल्लाह” ख़ास नाम है रब तबारक व ताआला का, कहा जाता है की इस्मे आज़म यही है

इसलिए की तमाम उम्दा सिफतों के साथ यही मौसूफ़ होता है, जैसे की कुरआन पाक में है...
यानी वह अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं,  जो छुपे-खुले का जानने वाला है, मुहाफ़िज़ है,
जो रहम करने वाला मेहरबान है, वह अल्लाह जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं जो बादशाह है, पाक है, सलामती वाला है, अमन देने वाला है, ग़लबे वाला है, ज़बरदस्त है, बड़ाई वाला है, वह हर शिर्क से और शिर्क की चीजों से पाक है, वह "अल्लाह" पैदा करने वाला, बनाने वाला, सूरत बख्शने वाला है, उसके लिए बेहतरीन पाकीज़ा नाम है, आसमान व ज़मीन की तमाम चीज़े उसकी तस्बीह बयान करती है, वह इज्ज़तों और हुकूमतों वाला है!

इन आयातों में बाक़ी तमाम नाम सिफ़त है और अफ्ज़ “अल्लाह” की सिफ़त है, पस असली नाम “अल्लाह” है जैसे एक और जगह फ़रमाया की “अल्लाह” ही के लिए है पाकीज़ा और उम्दा नाम ! पस तुम उसको उन नामों से पुकारो ! और फरमाता है “अल्लाह” को पुकारो या “रहमान“ को पुकारो जिस नाम से पुकारो उसी के प्यारे-प्यारे और अच्छे–अच्छे नाम है ! 

to be continued...

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मर्द की कहानी

' मर्द ' जिसका दर्द सुनने समझने वाला कोई नही, मर्द को जज़्बात, एहसासात से ख़ाली और हवस से लबरेज़ ऐसा ज़ालिम मान लिया गया है जो औरतों को घूरता है, छेड़ता है, रेप करता है, शादी भी सिर्फ़ अपनी जिस्मानी ख़्वाहिश पूरी करने के लिए करता है, दिल भरने पर तलाक़ दे देता है, फिर दूसरी शादी कर लेता है, औरतों के लिये हमेशा क़सीदे पढ़े गये, " वो मां है, बहन है, बीवी है, बेटी है " , है, बेशक है, किसे इनकार है लेकिन मर्द भी तो एक बाप है, भाई मै, शौहर है, बेटा है, या बस वो हवस का पुजारी ही है, कभी सोचा उस बाप के बारे मे जो तमाम ज़िंदगी अपनी बेटी की शादी के लिए पाई पाई जोड़ता है, पुराना सूट, पुराना स्कूटर, पुरानी घड़ी मे वक़्त गुज़ारता है, रातों को चैन से सो नही पाता, कभी सोचा उस भाई के बारे मे जो अपनी बहन को सारी दुनिया की परेशानियों से और बुरी नज़रों से महफ़ूज़ रखना चाहता है, भात, छूछक, यहाँ तक कि मरने के बाद भी समाज ने भाई पर बहन की कुछ ज़िम्मेदारियां लाद दी हैं , और वो भाई इसे अपनी ज़िम्मेदारी मान कर कर रहा है, अपनी जान तक की परवाह नही करता, वो शौहर भी तो एक मर्द है जो एक औरत को अपने दिल की रानी और घर की मालकिन बना कर रखता है , वो बेटा भी तो एक मर्द ही है जो अपनी माँ के कदमों मे दुनिया और जन्नत की ख़ुशियां ढूंढता है ,
कभी उस मर्द का दर्द भी तो महसूस कीजिये जिससे उसकी बीवी सारी तनख़्वाह छीन लेती है, महीने भर जेबख़र्च भी वो बीवी से मांगता है और इसे उसने अपना मुक़ददर मान कर सब्र कर लिया है, वो मर्द जो अपने बाप भाई मां बहन पर खुल कर ख़र्च नही कर सकता , अपने साथ नही रख सकता, मिल नही सकता और बीवी को यह सब करते देखता है बल्कि इस सब पर ख़ुश भी होकर दिखाना पड़ता है, मै तो ऐसे भी बहुत से मर्दों को जानता हूँ जो अपनी बीवी के नाजायज़ ताल्लुक़ात को जानकर भी चुप हैं , कभी उन मर्दों के लिए हमदर्दी नही जागती जो नाजायज़ ताल्लुक़ात के चलते क़त्ल कर दिये गये, रेप के झूठे इल्ज़ामों मे जैल चले गये, बदनाम हुए, ज़लील हुए, बर्बाद हो गये, प्यार मे धोखा खा कर कितनों ने ख़ुदकुशी की, कितने पागल हुए, कितने नशेड़ी बने ? कोई नही देख रहा ?
इस सबके बावजूद औरतों के लिये आवाज़ भी हमेशा मर्दों ने ही उठायी, मैने कभी किसी औरत को मर्दों के लिए आवाज़ नही उठाते देखा , मेरा कहना यह नही कि औरतों के साथ कुछ ग़लत नही हुआ, सवाल यह है कि औरतों की जनरल इमेज 'देवी' की और मर्द की 'ऱाक्षस' की क्यों बना रखी है ?


Nadeem Akhter 






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Unity

1948 में मग़रिबी ताक़तों ने मिलकर फ़िलस्तीन के एक बड़े इलाक़े को अरबों से छीन कर, उस पर यहूदियों को एक मुल्क बना कर दे दिया और इज़राईल बनते ही शुरू के 19 साल यहूदियों ने मुसलसल अपने पड़ोसी अरब मुल्कों से जंग जारी रखी और 1967 में येरूशलम (बैतुल मक़दिस) पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसके बाद से आज तक Middle East के मुस्लिम मुल्कों में अमन क़ाएम नहीं होने दिया.

यहूदियों को उरूज हासिल होना तब से शुरू हुआ है जब से उन्होंने ये फ़ैसला किया कि हम एक ख़ुदा, एक तौरात और एक शरिअत की बुनियाद पर एक क़ौम हैं. हम में कोई जर्मनी में रहता हो या अमेरिका में, नाइजिरिया में रहता हो या फ़िलीपीन्स में, हम एक क़ौम हैं. उसे *इस बात पर कामिल ईमान और यक़ीन रखना चाहिये है कि उसे एक दिन उस अरज़े मुक़द्दस, येरूशलम लौटना है, जहाँ उसका मसीहा आएगा और वो उनके लिये हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की तरह एक आलमी हुकूमत क़ाएम करेगा. वो इस बात की भी तैयारी कर रहे हैं कि उन्हें मुसलमानों के साथ एक बहुत बड़ी #आलमी जंगलड़नी है. ये तसव्वुर जब से उनके दिलों दिमाग़ में दाख़िल हुआ और बहैसियत क़ौम इस पर यक़ीन करते हुए अमल करना शुरू किया, उसके बाद उनकी तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करने की रफ़्तार ना क़ाबिले यक़ीन हद तक तेज़ हो गई. इस तरह आलमी सहयूनी तंज़ीम की ताक़त और यूनिटी का आप अंदाज़ा कर सकते हैं. इस तरह एक नज़रिये ने हज़ारों साल दरबदर रहने वाले यहूदियों को अपना आबाई वतन लौटा दिया.

पर क्या ये दुनिया का पहला इत्तेहाद का नज़रिया था जो कामयाब हुआ ?

हरगिज़ नहीं !

सबसे पहले ये नज़रिया हमारे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रियासते मदीना की बुनियाद रखते हुए पेश किया : तमाम मुसलमान आपस में भाई भाई हैं और इसलाम की बुनियाद पर वो एक क़ौम हैं. और फिर दुनिया ने देखा कि इस नज़रिये ने उस वक़्त की सुपर पॉवर क़ैसर (Rome) व किसरा (Iran) को शिकस्त दी. और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आख़िरी ख़ुत्बे में फ़रमाया : किसी अरबी को अजमी पर, किसी गोरे को काले पर कोई फ़ज़ीलत नहीं. और फिर दुनिया ने इस नज़रिये और आपसी इत्तेहाद की ताक़त का नतीजा दुनिया के हर कोने तक इसलाम पहुँचने की सूरत में देखा. नज़रिया इत्तेहादे उम्मत, दुनिया का कामयाब तरीन नज़रिया है. दुशमनाने इसलाम जानते हैं कि जब तक हम बिखरे रहेंगें तब तक हम वैसे ही ज़लील होते रहेंगें जिस तरह हज़ारों साल तक यहूदी रहे थे !!!!


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Parda

(ऐ रसूल) ईमानदारों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं ख़ुदा उससे यक़ीनन ख़ूब वाक़िफ है (30)
और (ऐ रसूल) ईमानदार औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार (के मक़ामात) को (किसी पर) ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो (छुप न सकता हो) (उसका गुनाह नही) और अपनी ओढ़नियों को (घूँघट मारके) अपने गरेबानों (सीनों) पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने (क़िस्म की) औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या (घर के) नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर (बहुत बूढे होने की वजह से) औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या वह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा (किसी पर) अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार (झंकार वग़ैरह) की ख़बर हो जाए और ऐ ईमानदारों तुम सबके सब ख़ुदा की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ (31)

शेह्वत के पुजारी आजादी के नाम पर औरतों को बरहना करने की वकालत करते है अपनी गरज के लिए ।



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क़ब्र और दुनिया

क़ब्र में सिर्फ़ मिट्टी दिखाई देती है मगर उसके अंदर का हिस्सा हसरतों और अज़ाब से भरा होता है।

उसका बाहरी हिस्सा मिट्टी से बना होता है। जबकि उसके अंदर परेशानिया और मुश्किलें , हसरत व अफसोस के साथ उबल रही होती हैं जिस तरह कि हाँडियां अपने अंदर मौजूद चीज़ों के साथ उबलती हैं।

अल्लाह की क़सम! (क़ब्र ने) ऐसी नसीहत की है कि किसी नसीहत करने वाले के लिए कोई बात नहीं छोड़ी है।

ऐसा लगता है जैसे वहा से आवाज़ आती हो  : ऐ दुनिया के इंसानों  तुम ने एक ऐसे घर को आबाद किया है जिसको तुम जल्द ही छोड़कर जाने वाले हो (दुनिया), और एक ऐसे घर को बर्बाद कर दिया है जिसकी तरफ तुम जल्दी से पहुचने  वाले हो।

तुम ने एक ऐसे घर को आबाद किया है जिसका फ़ायदा दूसरों के लिए है, और तुम ने एक ऐसे घर को बर्बाद व वीरान कर दिया है जिसका घर तुम्हारे सिवा किसी और के लिए नहीं है।

यह (दुनिया) एक दूसरे से आगे बढ़ने का घर, अमालों का गोदाम और आखिरत की खेती करने का मोका है, और यह (क़ब्र) इबरत पकड़ने की जगह , जन्नत के बगीचों में से एक बगीचा या जहन्नम की खाईयों में से एक खाई है ।

 कब्र

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