रविवार, फ़रवरी 28, 2016

ज़िन्दगी में दख़ल

सुर्ख़ स्याही को दिल में छुपाती रही
ज़िन्दगी भर हमें वो रिझाती रही

जैसे चाहा जहाँ लोग भटका किये
नार जलवे फिर उनको दिखाती रही

दूर से मौत हम को डराती रही
इस तरफ़ ज़िन्दगी आज़माती रही

साजिशे लाख हो गम किसे है यहाँ
जब तेरी तरबियत रह दिखाती रही

दुश्मनी लोग मुझ से निभाते रहे
मुझको तालीम उनकी बचाती रही

ज़िन्दगी में दख़ल है अजल का मगर
साथ रह के वो शम्मा जलाती रही

तालिब-ए-इल्म हु याद रखना मुझे
इल्म की शम्मा रस्ता दिखाती रही

1. दुनिया, २. नार : जहन्नम की आग, 6. अजल : मौत,
-एम साजिद

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