गुरुवार, मार्च 31, 2016

माल-ए-ग़ैर



दुनिया में जो कुछ है वह सब हमारे लिए माल-ए-ग़ैर है, क्योके सब कुछ अल्लाह का है उसे अपने लिए जाईज़ करने की वाहिद सूरत है के अल्लाह के बाताए तरीक़े से हासिल किया जाए और उसे अल्लाह के बताए तरीक़े से इस्तेमाल किया जाए |

बुधवार, मार्च 30, 2016

रहबर ...

जो लोग सारी दुनिया को राह दिखाने वाले थे
क्या वो आज खुद भटक रहे है .... ?

कुरआन को इमाम बनाना एकमात्र रास्ता है, जिसका इमाम कुरआन है वही हक पर है, बाक़ी दुनियापरस्तों की पहचान इतनी मुश्किल भी नहीं ........

दरअस्ल हमसे दुनिया की लाज्ज़तें नहीं छूट रही !



नमाज़



नमाज़ इंसान को बुराईयों से पाक करती है, जब हम नमाज़ का इरादा करते है तो पहले पानी से वुज़ू करते है पानी बहुत बड़ी नेमत है जो इंसान के लिए हर किस्म की गन्दगी को धोने का बेहतरीन जरिया है, इसी तरह नमाज़ भी एक रब्बानी चश्मा है जिसमे नहाकर इंसान अपने आपको बुरे जज़्बात और गंदे खयालात से पाक करता है, नमाज़ बेहद कीमती है इसको हर हाल में कायम करना है |

सोमवार, मार्च 28, 2016

माबूद ..

इंसान अपनी फ़ितरत और अपने हालात के लिहाज़ से एक इसी मख्लूक है जो हमेशा अपने लिए एक सहारा चाहता है, एक एसी हस्ती जो उसकी कमियों की तलाफ़ी करे, और उसके लिए एतमाद और यकीन की बुनियाद हो, किसी को इस हैसियत से अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना अपना माबूद बनाना है |
इस मौजूदा दुनिया में अल्लाह नज़र नहीं आता,
इसलिए इंसान आमतौर पर नज़र आने वाली हस्तियों में से किसी हस्ती को वह मकाम दे देता है जो दरअसल अल्लाह का होना चाहिए |
ऐसा इसलिए भी होता है की इंसान के इर्द-गिर्द कुछ ज़ाहिरी रौनक देखकर लोग उसे बड़ा समझ लेते है और कोई अपने ग़ैर मामूली खूबियों से लोगो को मुतास्सिर कर लेता है, और भी बहुत वजह है |
मगर फिक्र की बात ये है लोग अल्लाह के सिवा को अपना माबूद बना लेता है ऐसा करना हमेशा की नाकामयाबी है |

गुरुवार, मार्च 24, 2016

बाग़

आदमी जवानी की उम्र में बाग़ लगाता है ताकी बुढ़ापे की उम्र में उसका फल खाए, फिर वह शख्स कैसा बदनसीब है जिसका हरा-भरा बाग़ उसकी आख़िरी उम्र में ऐन उस वक़्त बर्बाद हो जाए |
जबकि वह सबसे ज़्यादा उसका मोहताज हो और उसके लिए वह वक़्त भी ख़त्म हो चूका हो जबकि वह ना बाग़ लगाए, उसे नए सिरे से तैयार करे, क्या रियाकारी का यही हासिल नहीं है... ?

निज़ाम

ज़मीन के ऊपर शुक्र, सब्र, तवाज़ो और कनाअत के साथ रहना ज़मीन की इस्लाह है इसके विपरीत नाशुक्री, बेसब्री, घमंड और हिर्स के साथ ज़मीन में रहना फसाद बरपा करना है क्योके इससे खुदा का कायम किया हुवा फ़ितरी निज़ाम टूटता है यह हद से निकल जाना है ।
जबके अल्लाह चाहता है हर एक अपनी हद के अंदर अमल करे।

मंगलवार, मार्च 22, 2016

दाई

किसी को अल्लाह की तरफ़ से सच्चाई हासिल हो और वह उसका दाई बनकर खड़ा हो जाय तो लोग उसके मुखालिफ़ बन जाते है क्योके उसके आह्वान में लोगो को अपनी हैसियत का नकार दिखाई देने लगता है |

सोमवार, मार्च 21, 2016

सिक्के

सुनो चंद सिक्कों ने उन्हें ज़ालिम बना दिया !
तुम इन सिक्कों की मुहब्बत से बाज़ रहना !

भट्टी



यारों अब गफ़लत को छोड़ो, आग बरसने वाली है..!
ईमा की भट्टी दहका लो, जान निकलने वाली है...!
एम साजिद

रविवार, मार्च 20, 2016

दस्तरख्वान

दुनिया दो किस्म की गिज़ाओ का दस्तरख्वान :
एक इंसान वह है : जिसकी रूह की गिज़ा यह है के वह अपनी ज़ात को नुमाया होते हुवे देखे दुनिया की रौनके अपने इर्द-गिर्द पाकर उसे ख़ुशी हासिल होती हो, माद्दी साजोसामान का मालिक होकर वह अपने को कामयाब समझता है, ऐसा आदमी खुदा और आखिरत को भूला हुवा है | उसके सामने खुदा की बात आयगी तो वह उसे ग़ैर अहम समझ कर नज़रअंदाज़ कर देग़ा वह उसके साथ ऐसा सरसरी सलूक करेगा जैसे वह कोई संजीदा मामला ना हो बल्कि महज़ खेल तमाशा हो, ऐसे आदमी के लिए आख़िरत के इनामात में कोई हिस्सा नहीं |
दूसरा इंसान वह है : जो गैब की हकीकतों में गुम रहा हो, जिसकी रूह को आखिरत की याद में लज्ज़त मिली हो, जिसकी गिज़ा ये रही हो के वो खुदा की याद में जिया हो और खुदा की फ़जाओ में सांस लेता हो, यही वह इंसान है जिसके लिए आख़िरत रिज्क का दस्तरख्वान बनेगी, वह जन्नत के बागों में अपने लिए ज़िन्दगी का सामान हासिल कर लेगा, उसने गैब के आलम में खुदा को पाया था इसलिए इस ज़ाहिरी आलम में भी वो खुदा को पा लेगा |
हमारा दस्तरख्वान क्या है .... ?

शनिवार, मार्च 19, 2016

दिल ये क्यों आज मेरा भारी है

दिल ये क्यों आज मेरा भारी है
दिल की शायद नई बिमारी है

मेरे  जज़बात की न  बातें कर
मौत की हमको अब ख़ुमारी है

ज़ुस्तज़ू इस जहाँ की ना हमको
तुम ही ले लो, ये बस तुम्हारी है

एम साजिद

शुक्रवार, मार्च 18, 2016

शिफारिश

कायनात में मुख्तलिफ किस्म की चीज़े है इल्मी मुताला बताता है के इन चीजों का ज़हूर एक ही वक़्त में नहीं हुवा बल्कि एक के बाद एक हुवा है, कायनात का मुताला बताता है की इस कायनात का निजाम हद दर्जा मोहकम नियमों के तहत चल रहा है
हर चीज़ ठीक उसी तरह अमल करती है जिस तरह सामूहिक तकाज़े के तहत उसे अमल करना चाहिए यह तरतीब इस बात का सबूत है की इस निज़ाम-ए-कायनात का एक जिंदा मुदब्बिर है, जो हर लम्हा उसका इंतज़ाम कर रहा है कायनात का ये हैरान कर देने वाला निज़ाम खुद ही पुकार रहा है की उसका मालिक इतना कामिल और इतना अज़ीम है के जिसके यहाँ किसी सिफारिशी की सिफारिश चलने का कोई सवाल ही नही | में किसी की तरफ़ इशारा नहीं कर रहा में खुद में ढूढ़ रहा हु, में गाफ़िल तो नहीं !
(अल्लाह जिसको चाहे शिफारिश की इजाज़त दे)

रविवार, मार्च 13, 2016

शफ़क़त




मशक्कत से भरी दुनिया, ये दुनिया छोड़ दूंगा में
तेरे अनवार से रौशन वो लम्हे याद आते  है ..!!

हसद से दिल ये पुर मेरा, मुझे बर्बाद कर देगा
मुझे रौशन जहाँ के वो, ठिकाने याद आते है..!!

मेरा दिल ये रौशन था, तेरी शफ़क़त ने घेरा जब
मुझे अख़लाक़ के जलवे तुम्हारे याद आते है..!!


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