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Haj Subsidy Politics


ये काम अच्छा किया सब्सिडी ख़त्म कर दी इतना पैसा खर्च करके भी हम सरकार के एहसान के नीचे दबे पड़े थे और ताने अलग से मिलते थे, वोट पर हक जताने वाली सरकार की चाल भी सब्सिडी के साथ ख़त्म, एयर इंडिया ही से जाने की बंदिशे भी अब ना रहेंगी मुझे उम्मीद है दूसरी एयरलाइन्स बहुत सस्ते में सफ़र करा देगी, सरकार को चाहिए ये पैसा उन गरीबो के घर बनाने में खर्च कर जिनके पास घर नहीं है वैसे भी हज मुस्लिम पर वाजिब है सरकार पर नहीं फिर क्यों सब्सिडी दी जाय ?
हज फ़र्ज़ भी तभी होता है जब आप के पास उतनी दौलत हो, नमाज़ की तरह हर मुस्लिम पर फ़र्ज़ नहीं 
सरकार ने हज सब्सिडी खत्म कर दी है. काफी पहले खत्म हो जानी चाहिए थी. इसके साथ ही मुसलमानों पर सरकारी एहसान भी खत्म हुआ. अब दक्षिणपंथी संगठन और राजनीतिक दल हज में मुस्लिम तुष्टिकरण के ताने भी नहीं दे पाएंगे. किसी भी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में धार्मिक यात्रा कराना सरकार का काम नहीं होना चाहिए. मुस्लिम मान्यता के मुताबिक भी हज उसके ऊपर ही वाजिब है, जो अपनी दुनियावी जिम्मेदारियों से फारिग हों और जो हज पर जाने की क्षमता रखते हों.
हा ये बात और है मानसरोवर के सफ़र पर जाने वाले मुसाफिर को उत्त पदेश की सरकार पहले 25,000 फिर उसे अखिलेश ने 50,000 और अब योगी साहब ने 1 लाख कर दिया है... ये जारी रहना चाहिए ! हम इस फैसले से गदगद है! 
धन्यावाद
मुहम्मद साजिद अली

HajSubsidy, Politics 




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मदरसों की तालीम

मदरसों को लेकर किसी वसीम रिज़वी का बयान चर्चाओं मे है, सुनने मे आया है कि अपने सियासी आक़ाओं को ख़ुश करने के लिए उन्होने यह बेसुरा राग अलापा है हालाँकि बेसुरा है पर उनके सियासी आक़ाओं को यही बेसुरा राग पसंद है, यह भी सुना है कि नज़राना बतौर कुछ मिलने की उम्मीद भी वसीम रिज़वी को है, अच्छी बात यह है कि अक्सर शिया हज़रात ने भी और यहाँ तक कि बहुत से हिन्दुओ ने भी उनके इस बयान की मज़म्मत ( निंदा) की है,
रही बात मदरसों की तो सुनो मदरसें कहीं, जंगल, बीहड़ या टापूओं पर नही चल रहे कि वहाँ कुछ भी होता रहेगा और पता नही चलेगा, मदरसें बस्तियों के बीच या बस्तियों से लगी ज़मीन पर ही चलते हैं ,सबको सब कुछ दिखता है , ज़्यादातर बल्कि लगभग सभी मदरसे रजिस्टर्ड हैं तो क्या सरकार ने बिना तहक़ीक़ के रजिस्टर्ड कर दिये हैं ? बहुत से मदरसों को सरकार अनुदान देती है और कुछ मदरसों मे टीचर्स की तनख़्वाह भी सरकार देती है, कुछ मदरसे ऐसे हैं कि वहाँ से फ़ारिग़ मौलवी ग्रेजुएट के समकक्ष माना जाता है जैसे दारूल उलूम देवबंद, मज़ाहिर उलूम सहारनपुर , नदवातुल उलूम लखनऊ, वग़ैरह, यहाँ से पढ़ा हुआ मौलवी सेना तक मे भी जा सकते हैं, तो साबित हुआ कि मदरसे न सिर्फ़ सरकार की निगरानी मे बल्कि सरकार के सहयोग से चल रहे हैं , अब मदरसों को शक की नज़र से देखने वाले ख़ुद सोचें कि क्या सरकार किसी इतनी बड़ी व्यवस्था को सहयोग कर सकती है जो संदेहास्पद हो ? सहयोग की छोड़िये, क्या ग़ाफ़िल भी रह सकती है ? और पिछले चार सालों से तो सरकार भी.................. ख़ैर छोड़ो उस बात को,
कहना यह है कि मदरसों की दुनिया कोई अलग दुनिया नही है, न वो किसी और गृ्ह पर चल रहे हैं कि सरकार या बहुसंख्यक समाज की नज़रों से कुछ छिपा या बचा हुआ है, इसके बावजूद भी मुल्क का हर मदरसा हर किसी के लिये हर वक़्त खुला है जो चाहे, जब चाहे जाकर देख सकता है कि वहाँ क्या हो रहा है, क्या पढ़ाया जा रहा है, क्या सिखाया जा रहा है मदरसे इस मुल्क की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं, मदरसों मे पढ़ने वाले लाखों करोड़ो बच्चे इसी मुल्क मे अपना सामान्य जीवन जी रहे हैं, पढ़ाई पूरी करने के बाद भी वो मुल्क के दूसरे नागरिकों की तरह अपना सामान्य गृहस्थ जीवन जी रहे हैं ,
यह मौजूदा सूरत ए हाल है, तारीख़ की बात करें तो मुल्क की आज़ादी और तरक़्क़ी मे मदरसों का योगदान किसी से छिपा नही है!

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एक मुसलमान

मेरे जिन क़ाबिल दोस्तों ने साइंस ( फ़िजिक्स, कैमिस्ट्री, लाइफ़ साइंस  ) मे मास्टर डिग्री ( पी जी)  ली है उन्हे कुछ  कन्सेप्ट, थ्योरी, प्रिंसिपल समझ नही आये होंगे इसी तरह साहित्य ( उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी)  मे मास्टर करने वालों को कुछ पोयम्स, अश्आर,  पद्य समझ नही आये होंगे,  लेकिन क्या वो इतनी हिम्मत कर पायेंगे कि जो उन्हे समझ नही आया उसे वो ग़लत कह सकें ? नही , वो कहेंगे कि उन्हे समझ नही आया,  लेकिन मज़हब की कोई बात अगर किसी 'ठप' ' अहमक़ ' जाहिल  के भी समझ न आये तो वो फ़ोरन उस बात को ग़लत कह देगा,  यह नही कहेगा कि उसकी समझ नही आ रही,
एक और बात पर आप ग़ौर करें, क्या कोई बहुत क़ाबिल ज़हीन डॉक्टर भी इंजीनियरिंग की किताबें पढ़ कर ख़ुद को इंजीनियर कह सकता है  ? इंजीनियरिंग कर सकता है  ? किसी बुध्दू इंजीनियर को भी चैलेंज कर सकता है  ? नही न,  या इसके उलट देखें क्या कोई बहुत क़ाबिल  इंजीनियर,  डॉक्टरी की किताबें पढ़ कर ख़ुद को डॉक्टर कह सकता है  ? डॉक्टर की तरह प्रैक्टिस  कर सकता है ? किसी कमक़ाबिल डॉक्टर को चैलेंज कर सकता है  ? नही न,  लेकिन जैसे ही कोई दसवीं फ़ेल ( या कोई भी हो  )  दीन की दो किताबें पढ़ता है ख़ुद को आलिम फ़ाजिल, मुफ़्ती समझने लगता है  , फिर वो तमाम आलिम ए दीन को अपनी नज़र मे हक़ीर  ( इनफ़िरियर)  समझने लगता है , उन्हे परेशान करता है,  मुल्ला मुल्ला कहकर उनकी तौहीन शुरू कर देता है,
मै मानता हूं कि कुछ बातों को लेकर इख़तिलाफ़ है लेकिन ऐसा नही कि उलेमा मज़हब की असल रूह से ही दूर हो गये हों,  यह भी सही है कि मज़हब के नाम पर पाखन्ड और आडम्बर है लेकिन इसका मतलब यह नही कि मज़हब के नाम पर सिर्फ़ पाखन्ड और आडम्बर ही बचा है
सवाल उठता है कि यह तथाकथित पढ़ा लिखा आधुनिक वर्ग मज़हब से बेज़ार और उस पर तनक़ीद ( आलोचना  ) करता क्यों नज़र आता है  ?
पहली वजह यह है कि मज़हब जिस पाकीज़ा अनुशासित  और संजीदा ज़िंदगी का पैग़ाम देता है वो उन्हे बोझ लगता है,  यह तथाकथित आधुनिक वर्ग ज़िंदगी का मज़ा  लेना चाहता है,  हर तरह की अय्याशी और हर तरह से तरक़्क़ी करने को सही मानता है,  मज़हब इसमे रूकावट दिखता है तो वो  मज़हब छोड़ना तो नही चाहता लेकिन उसमे तबदीली चाहता है ताकि मज़हब मे रह कर भी वो तमाम तरह के मज़े ले सके
दूसरी वजह मीडिया ने जो मज़हब को अंधविश्वास,  रूढ़िवादिता और आतंकवाद से जोड़ा है तो वो उस इमेज से भी छुटकारा चाहता है,  वो अपने कलीग्ज़,  बोस, दोस्तों के सामने यह ज़ाहिर करना चाहता है कि मै ऐसा मुसलमान नही हूँ जैसा मुसलमान तुम सुन या समझ रहे हो,  मै कुछ अलग तरह का मुसलमान हूँ,  कुछ अलग  ,पढ़ा लिखा, आधुनिक,  वो तो और मुसलमान हैं जिन्हे तुम मुसलमान समझ रहे हो,  अपने उन दोस्तों के सामने उन पुरानी  तरह के मुसलमानों को बुरा भला भी कहेगा,  हालाँकि होना यह चाहिए था कि वो मुसलमानों की मीडिया के ज़रिये बनायी इमेज को झूठा साबित करता ऐसा वो अपनी नालायक़ी की वजह से नही कर सका इसलिए उसने उन मुसलमानों की एक अलग क्लास बना दी,  पुराने, दक़ियानूस मुसलमानl
Nadeem Akhter


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धर्म और हम

आप किसी भी धर्म को तब तक नही समझ सकते जब तक उस धर्म मे आपकी आस्था न हो, आज के दौर की सबसे बड़ी बकवासबाज़ी की असल और इकलौती वजह यही है कि हम सब हर धर्म का विद्वान बनना चाहते हैं,
आस्था के बाद दूसरी चीज़ है स्टडी , स्टडी करके आप तबतक किसी धर्म के जानकार नही बन सकते जब तक आपको वो ज़बान महारत के साथ न आती हो जिस ज़बान मे उस धर्म के मूल ग्रन्थ हैं, सिर्फ़ अनुवाद पढ़कर आप विद्वान नही बन सकते और मुझे मालूम है कि मेरी इस बात पर सबसे ज़्यादा लोगों को ऐतराज़ होगा , लेकिन यह हक़ीक़त है, अगर वेदों का विद्वान बनना है तो संस्कृत और क़ुरान का विद्वान बनना है तो अरबी सीखनी पड़ेगी, नही तो फिर उन लोगों पर यक़ीन करो जिन्होंने उन ग्रन्थों को उन ग्रन्थों की मूल ज़बान मे आस्था के साथ समझा है
आस्था तो है ही नही मालूमात का आलम यह है कि किसी से कहीं कुछ सुन लिया , कहने वाले पर भी ध्यान नही दिया कि उसके नॉलिज का लेवल क्या है ? कहीं से कोई किताब पढ़ ली, न यह देखा कि वो किताब किसने छापी ? कहां से छपी ? उस किताब मे जिन किताबों का ज़िक्र है उस नाम की किताब है भी या नही या उस किताब मे यह लिखा भी है या नही जो उस किताब के हवाले से इसमे छाप दिया गया है, वो बात अगर है भी तो किन हालात मे कही गयी ? किन हालात के लिए कही गयी ? इतना समझने की परेशानी तो ख़ैर कोई क्यों उठाये ?
इसलिए किसी भी धर्म पर सवाल उठाने से पहले यह समझ लो कि एक तो आपकी आस्था उस धर्म मे नही दूसरे आपकी मालूमात का लेवल क्या है ? मालूमात की सोर्स क्या है ? आप 10 रूपये की 12 पन्नो की कोई किताब पढ़कर उस धर्म को चैलेंज करने लगते है जिस धर्म पर सदियों से रिसर्च हो रही होती है, लोगों की पूरी पूरी ज़िंदगियां निकल गयी एक बात को समझते सनझते!
Nadeem Akhter 







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रिश्वत और सूद

'रिश्वत' लेना जुर्म है , सब मानते हैं, और रिश्वत देना ? वो भी जुर्म है, और रिश्वत के लेन देन मे मध्यस्थता करना ? ज़ाहिर है वो भी जुर्म है , अब अगर कोई कहे कि रिश्वत लेने वालों का, रिश्वत देने वालों का और रिश्वत के लेन देन मे मध्यस्थता करने वालों का बायकाट करो तो यह बात कहने वाला इस वक़्त का समाज सुधारक कहलायेगा, उसके नारे लगेंगे, गजरे डाले जायेंगे, और अगर उसके कहने से कुछ लोगों ने रिश्वत लेना देना छोड़ दिया तो कहने वाले की तस्वीरें किताबों मे छप जायेगी,
लेकिन अगर कोई सूद के लेने, देने और सूद के लेन देन मे मध्यस्थता करने को मना करता है तो वो इस दौर का सबसे बड़ा जाहिल, रूढ़िवादी और विकास विरोधी माना जा रहा है क्योंकि कहने वाला मुसलमान है, ऊपर से मौलवी, मौलवी पर तो रूढ़िवादी, कटटर जैसे अलफ़ाज़ बहुत सूट करते हैं, और मौलवी को कटटर रूढ़िवादी कहकर ख़ुद को आधुनिक, शिक्षित, विकसित मान लेने की फ़ीलिंग भी अलग ही है, इसलिए सूद अच्छी चीज़ हो न हो पर मौलवी ने क्यों कहा ? मौलवी की मुख़ालफ़त का आलम यह है कि अगर मौलवी नंगे रहने, ज़िना करने या शराब पीने को भी ग़लत बता दे तो कुछ लोग शराब पीकर, नंगे होकर सड़क पर ज़िना करेंगे
अब बात करते हैं सूद की, सूद शोषण की एक वजह है, सूद की वजह से न जाने कितनों के मकान सूदख़ोर ने क़ब्ज़ा लिये, कितनों के खेत क़ब्ज़ा लिये, न जाने कितने ग़रीबों की लड़कियों, बीवियों के साथ ग़लत काम सूदख़ोरों ने किया, न जाने कितने ग़रीबों को ख़ुदकुशी करनी पड़ी, सूद एक बड़ी बुराई है इसका ख़त्म होना ज़रूरी है, यह क़ायदा है कि जब किसी बुराई को ख़त्म किया जाता है तो उस बुराई के फलने फूलने, पनपने के रास्ते भी बंद किये जाते हैं, चूँकि मज़हब ए इस्लाम सूद को ख़त्म करना चाहता है इसलिए वो सूद को लेने, देने , सूद के लेन देन मे मध्यस्थता करना इन सबको नाजायज़ क़रार देता है और सूद के लेने, देने, लेनदेन की मध्यस्थता करने वालों का सोशल बायकाट करने की भी बात करता है, अब मज़हब ए इस्लाम के विद्वान मज़हब ए इस्लाम के अनुसार ही तो अपनी बात कहेंगे या पब्लिक का रूजहान देखकर कहेंगे ?
अब तुम्हें नही मानना है तो न मानो लेकिन बात तो तुम्हारी मर्ज़ी के मुताबिक़ नही कही जायेगी


Nadeem Akhter 

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हम वफ़ादार थे, हैं, रहेंगे

' वफ़ादारी ' एक ऐसा लफ़्ज़ जिस पर बहुत कुछ कहा, सुना गया, शायरी भी की गयी, वफ़ादारी का विलोम ( antonym, मुतज़ाद) है ग़ददारी , जिस तरह हर इंसान ख़ुद को और अपनी क़ौम को वफ़ादार साबित करने के लिए लम्बे चौड़े दावे करता रहता है इसी तरह हर शख़्स दूसरे इंसान और उसकी क़ौम को ग़ददार साबित करने मे भी देर नही लगाता, वफ़ादारी का इम्तिहान लेने के लिए जो सबसे बड़ी शर्त है वो है ' अपनाना ' यानी जब तक आप किसी को अपनायेंगे नही आप उसकी वफ़ादारी का इम्तिहान नही ले सकते , यानि हम अपने नौकर, दोस्त, बीवी, पार्टनर की वफ़ादारी का इम्तिहान ले सकते हैं क्योंकि हम उन्हे अपना चुके हैं, अब कोई भी ऐसा शख़्स जिससे हमारा कोई ताल्लुक़ ही नही, कोई रिश्ता ही नही उसकी क्या वफ़ादारी और क्या ग़ददारी ?
अब इस कंसेप्ट पर मुसलमानों के बारे मे बात करते हैं, देश की साम्प्रदायिक ताक़तें हमेशा मुसलमानों की वफ़ादारी पर सवाल उठाती रही हैं, उन मुसलमानों की वफ़ादारी पर जिन्हे इन साम्प्रदायिक ताक़तों ने कभी अपनाया ही नही, मुसलमानों की दाढ़ी से नफ़रत, टोपी से नफ़रत, कुर्ते से नफ़रत, बुर्क़े से नफ़रत और सवाल वफ़ादारी पर , अपने मुहल्लों मे रहने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, चुनाव मे टिकट नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, स्कूल / कॉलेज मे पढ़ने नही देंगे और सवाल वफ़ादारी पर, नौकरी देंगे नही और सवाल वफ़ादारी पर, दोस्त बनायेंगे नही, बस मे बराबर की सीट पर बिठायेंगे नही, जायदाद न ख़रीदेंगे, न बेचेंगे, और सवाल वफ़ादारी पर , तो भाई जब आपने हमे अपनाया ही नही तो वफ़ादारी का इम्तिहान कैसे लिया ?
एक बात और समझो , वफ़ादारी एक तो होती है मुल्क से जिसके लिए हम वफ़ादार थे, हैं, रहेंगे , किसी पार्टी या किसी नेता का वफ़ादार होने के लिए हम मजबूर नही, साम्प्रदायिक पार्टियों और नेताओं के लिए तो बिलकुल नही, रही बात समाज की तो भाई अपनाकर देखलो, हमेशा वफ़ादार निकलेंगे, हां अफ़राज़ुल के घरवाले शम्भूलाल के वफ़ादार नही होंगे, जो तुम चाहते हो

Nadeem Akhter



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मर्द की कहानी

' मर्द ' जिसका दर्द सुनने समझने वाला कोई नही, मर्द को जज़्बात, एहसासात से ख़ाली और हवस से लबरेज़ ऐसा ज़ालिम मान लिया गया है जो औरतों को घूरता है, छेड़ता है, रेप करता है, शादी भी सिर्फ़ अपनी जिस्मानी ख़्वाहिश पूरी करने के लिए करता है, दिल भरने पर तलाक़ दे देता है, फिर दूसरी शादी कर लेता है, औरतों के लिये हमेशा क़सीदे पढ़े गये, " वो मां है, बहन है, बीवी है, बेटी है " , है, बेशक है, किसे इनकार है लेकिन मर्द भी तो एक बाप है, भाई मै, शौहर है, बेटा है, या बस वो हवस का पुजारी ही है, कभी सोचा उस बाप के बारे मे जो तमाम ज़िंदगी अपनी बेटी की शादी के लिए पाई पाई जोड़ता है, पुराना सूट, पुराना स्कूटर, पुरानी घड़ी मे वक़्त गुज़ारता है, रातों को चैन से सो नही पाता, कभी सोचा उस भाई के बारे मे जो अपनी बहन को सारी दुनिया की परेशानियों से और बुरी नज़रों से महफ़ूज़ रखना चाहता है, भात, छूछक, यहाँ तक कि मरने के बाद भी समाज ने भाई पर बहन की कुछ ज़िम्मेदारियां लाद दी हैं , और वो भाई इसे अपनी ज़िम्मेदारी मान कर कर रहा है, अपनी जान तक की परवाह नही करता, वो शौहर भी तो एक मर्द है जो एक औरत को अपने दिल की रानी और घर की मालकिन बना कर रखता है , वो बेटा भी तो एक मर्द ही है जो अपनी माँ के कदमों मे दुनिया और जन्नत की ख़ुशियां ढूंढता है ,
कभी उस मर्द का दर्द भी तो महसूस कीजिये जिससे उसकी बीवी सारी तनख़्वाह छीन लेती है, महीने भर जेबख़र्च भी वो बीवी से मांगता है और इसे उसने अपना मुक़ददर मान कर सब्र कर लिया है, वो मर्द जो अपने बाप भाई मां बहन पर खुल कर ख़र्च नही कर सकता , अपने साथ नही रख सकता, मिल नही सकता और बीवी को यह सब करते देखता है बल्कि इस सब पर ख़ुश भी होकर दिखाना पड़ता है, मै तो ऐसे भी बहुत से मर्दों को जानता हूँ जो अपनी बीवी के नाजायज़ ताल्लुक़ात को जानकर भी चुप हैं , कभी उन मर्दों के लिए हमदर्दी नही जागती जो नाजायज़ ताल्लुक़ात के चलते क़त्ल कर दिये गये, रेप के झूठे इल्ज़ामों मे जैल चले गये, बदनाम हुए, ज़लील हुए, बर्बाद हो गये, प्यार मे धोखा खा कर कितनों ने ख़ुदकुशी की, कितने पागल हुए, कितने नशेड़ी बने ? कोई नही देख रहा ?
इस सबके बावजूद औरतों के लिये आवाज़ भी हमेशा मर्दों ने ही उठायी, मैने कभी किसी औरत को मर्दों के लिए आवाज़ नही उठाते देखा , मेरा कहना यह नही कि औरतों के साथ कुछ ग़लत नही हुआ, सवाल यह है कि औरतों की जनरल इमेज 'देवी' की और मर्द की 'ऱाक्षस' की क्यों बना रखी है ?


Nadeem Akhter 






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Unity

1948 में मग़रिबी ताक़तों ने मिलकर फ़िलस्तीन के एक बड़े इलाक़े को अरबों से छीन कर, उस पर यहूदियों को एक मुल्क बना कर दे दिया और इज़राईल बनते ही शुरू के 19 साल यहूदियों ने मुसलसल अपने पड़ोसी अरब मुल्कों से जंग जारी रखी और 1967 में येरूशलम (बैतुल मक़दिस) पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसके बाद से आज तक Middle East के मुस्लिम मुल्कों में अमन क़ाएम नहीं होने दिया.

यहूदियों को उरूज हासिल होना तब से शुरू हुआ है जब से उन्होंने ये फ़ैसला किया कि हम एक ख़ुदा, एक तौरात और एक शरिअत की बुनियाद पर एक क़ौम हैं. हम में कोई जर्मनी में रहता हो या अमेरिका में, नाइजिरिया में रहता हो या फ़िलीपीन्स में, हम एक क़ौम हैं. उसे *इस बात पर कामिल ईमान और यक़ीन रखना चाहिये है कि उसे एक दिन उस अरज़े मुक़द्दस, येरूशलम लौटना है, जहाँ उसका मसीहा आएगा और वो उनके लिये हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की तरह एक आलमी हुकूमत क़ाएम करेगा. वो इस बात की भी तैयारी कर रहे हैं कि उन्हें मुसलमानों के साथ एक बहुत बड़ी #आलमी जंगलड़नी है. ये तसव्वुर जब से उनके दिलों दिमाग़ में दाख़िल हुआ और बहैसियत क़ौम इस पर यक़ीन करते हुए अमल करना शुरू किया, उसके बाद उनकी तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करने की रफ़्तार ना क़ाबिले यक़ीन हद तक तेज़ हो गई. इस तरह आलमी सहयूनी तंज़ीम की ताक़त और यूनिटी का आप अंदाज़ा कर सकते हैं. इस तरह एक नज़रिये ने हज़ारों साल दरबदर रहने वाले यहूदियों को अपना आबाई वतन लौटा दिया.

पर क्या ये दुनिया का पहला इत्तेहाद का नज़रिया था जो कामयाब हुआ ?

हरगिज़ नहीं !

सबसे पहले ये नज़रिया हमारे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रियासते मदीना की बुनियाद रखते हुए पेश किया : तमाम मुसलमान आपस में भाई भाई हैं और इसलाम की बुनियाद पर वो एक क़ौम हैं. और फिर दुनिया ने देखा कि इस नज़रिये ने उस वक़्त की सुपर पॉवर क़ैसर (Rome) व किसरा (Iran) को शिकस्त दी. और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आख़िरी ख़ुत्बे में फ़रमाया : किसी अरबी को अजमी पर, किसी गोरे को काले पर कोई फ़ज़ीलत नहीं. और फिर दुनिया ने इस नज़रिये और आपसी इत्तेहाद की ताक़त का नतीजा दुनिया के हर कोने तक इसलाम पहुँचने की सूरत में देखा. नज़रिया इत्तेहादे उम्मत, दुनिया का कामयाब तरीन नज़रिया है. दुशमनाने इसलाम जानते हैं कि जब तक हम बिखरे रहेंगें तब तक हम वैसे ही ज़लील होते रहेंगें जिस तरह हज़ारों साल तक यहूदी रहे थे !!!!


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